पतझड़ की एक शाम
पतझड़ की यह शाम
पत्ते पड़े है इधर उधर
बिना मकसद बिना मंजिल
जा रहा हूँ मैं किधर
पीले पत्तो के द्वीपों पर
नहीं रखता हूँ मैं पैर
एक आध पर फिर भी लेकिन
पड़ ही जाते ई, खैर
सूरज उधर से डूब रहा है
कर रहा है दुनिया को अनाथ
शाम रुपी प्रियतमा आकर
थाम रही है उसका हाथ
एक गिलहरी एक चिड़िया
सब जा रहे है अपने घर
सब चल दिए अपनी अपनी दिशा में
पर जा रहा हूँ में किधर
हवा के झोंके हलके हलके
आकर कह रहे है मेरे कानो में
याद जिसको कर रहा है तू
वो भी है तेरे ही यादो में
मैं हँसा और मुस्कुराया
लेकिन फिर भी चलता रहा
जवाब में लेकिन उस झोंके को
अपने पास बुलाकर मैंने कहा
जब शाम इतनी खूबसूरत है
हर दिशा बन जाती है मंजिल
इसलिए चल रहा हूँ वही वही
जहा पे जाने को कहता है मेरा दिल
बस इतना कह कर चुप हो गया
ना रुका ना थमा न हुआ अचल
चलता गया चलता गया मैं
बस ओढ़े कुछ यादों का आँचल.
------------------- A.S