Monday, June 07, 2010

Few thoughts -- Poetically

पतझड़ की एक शाम

पतझड़ की यह शाम
पत्ते पड़े है इधर उधर
बिना मकसद बिना मंजिल
जा रहा हूँ मैं किधर

पीले पत्तो के द्वीपों पर
नहीं रखता हूँ मैं पैर
एक आध पर फिर भी लेकिन
पड़ ही जाते ई, खैर

सूरज उधर से डूब रहा है
कर रहा है दुनिया को अनाथ
शाम रुपी प्रियतमा आकर
थाम रही है उसका हाथ

एक गिलहरी एक चिड़िया
सब जा रहे है अपने घर
सब चल दिए अपनी अपनी दिशा में
पर जा रहा हूँ में किधर

हवा के झोंके हलके हलके
आकर कह रहे है मेरे कानो में
याद जिसको कर रहा है तू
वो भी है तेरे ही यादो में

मैं हँसा और मुस्कुराया
लेकिन फिर भी चलता रहा
जवाब में लेकिन उस झोंके को
अपने पास बुलाकर मैंने कहा

जब शाम इतनी खूबसूरत है
हर दिशा बन जाती है मंजिल
इसलिए चल रहा हूँ वही वही
जहा पे जाने को कहता है मेरा दिल

बस इतना कह कर चुप हो गया
ना रुका ना थमा न हुआ अचल
चलता गया चलता गया मैं
बस ओढ़े कुछ यादों का आँचल.
------------------- A.S

2 comments:

  1. Sooooooo beautiful and deep.I don't think we will miss Premchand or HR Bachchan if we have such poets around.

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  2. Thanks "Anonymous"... Most precious response I could have...

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